Thursday, May 3, 2007

रशमि के लिये ...

बहुत कुछ कहना है तुमसे
नहीं जानता क्या
पर जानता हूँ
बहुत कुछ कहना है
एक मौका देती है
हर मुलाकात तुम्हारी
पर शब्द नहीं मिलते
शब्द मिलते हैं तो
जुड़ नहीं पाते
जुड़ने की कोशिश में
फ़िर बिखर जाते
मानो कोई महल हो
ताश के पत्तों का
एक पत्ता गलत लग गया
तो सारे गिर जाते हैं
फिर सोचता हूँ नया नक्शा
और एक महल बनाता हूँ
वो भी गिर जाता
या शायद मैं गिराता हूँ
बन ना सका महल तो
पर इस जुस्तज़ू में
नक्शे भरना सीख गया हूँ
कह ना सका
तुमसे दो लव्ज़ भी
पर दिन भर बातें
खुद से करना सीख गया हूँ

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